Friday, February 20, 2009


हम सब कितने बेदर्द हैं सब कितने खुदगर्ज़ हैं हम न किसी के सुख में सुखी हैं हम न किसी के गम में दुखी हैं हमें परवाह है तो केवल अपनी क्योंकि हम सब खुदगर्ज़ इंसान हैं इंसानियत की शक्ल में हैवान हैं ॥ हम औरों को तो बहुत दूर अपनों को भी खुशहाल नही देख सकते गैर तो गैर हैं , हम तो ख़ुद भी अपनों के घाव नही सेक सकते क्योंकि हमारी स्वार्थ ही राह है स्वार्थ धर्म है , स्वार्थ ही चाह है क्योंकि हम खुदगर्ज़ इंसान हैं इंसानियत की शक्ल में हैवान हैं ॥ हम किसी के जलते घरों से होली मनाते हैं हम किसी के अंधेरों से दिवाली मनाते हैं हमें औरों को रूलाने में मज़ा आता है शर्म के आंसू दिलाने में मज़ा आता है क्योंकि हम सब खुदगर्ज़ इंसान हैं इंसानियत की शक्ल में हैवान हैं ॥ हम छोटे छोटे बच्चों को राहों में भीख मांगते देखते है जिनके दूध पीने की उम्र है उनको मिटटी फांकते देखते हैं हम झिड़क देते हैं उनको सिर्फ दो - दो पैसों के लिए फूंक देते हैं हजारों यूँ ही शौक के लिए , ऐशों के लिए हम उन्हें अपने सीने से नहीं लगा सकते हम उन्हें अपनों की तरह चूम नहीं सकते क्योंकि हम सब खुदगर्ज़ इंसान हैं इंसानियत की शक्ल में हैवान हैं ॥
(उपरोक्त कविता काव्य संकलन falakdipti से ली गई है )

1 comment:

K.P.Chauhan said...

priy bandhu sharma ji aapneapni kawitaa"swarth ki chaah hai kyounki hamsab khudgarj insaan hain ,insaaniyat ki shakl main haiwaan hain "men aaj ke samaaj ki wastviktaa ko ujaagar kiyaa hai ,padkar dil baag baag ho gyaa bahut hi achchhaa lagaa kirpyaa isi prakar likhte rahen ,dhanywaad